** माघ महिना (मालवी गीत ) **
गयो कुवांर, कार्तिक, अग्गण ने पोस |
लगी गयो माघ बलम, तमके नी होंस |
उगता की तेजी, न असत्या की लाली
सूरज, दबतो-छूपतो, जइ रयो खाली
ठंड ने ठंडो करियो, उको बी जोस
बाली उमर, गऊँ में अइ लागी बाली
बैठी गी तल घेघरी, चणा की डाली
किरसाणी हिया में, जाग्यो संतोष
दन लम्बा वइर् या, ई राता घटी री
सूरज अने चंदा में अच्छी पटी री
दोई जमइर् या हे, विरहण पे धोंस
सूक्की तळई सी, वइगी हे आँख्या
फड़फड़ई, बैठी गी, चिड़कली पाँख्या
फूटी किस्मत अपणी, की के दां दोस
'सुशील', फूली-फली सरसों लेहराणी
घुमीरिया भँवरा, सजी तितली राणी
फूलां पे थिरकी री, मोती सी ओस
गीतकार
डॉ राजेश रावल "सुशील"
गोंदिया, उज्जैन (मध्यप्रदेश )
9926233477